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Shivashtak

Ashtakam · 8 verses · 2 min read

।। श्री शिवाष्टक ।।

The Above Recitation is by Ravindra Sathe.

Verse 1

आदि अनादि अनंत अखंड अभेद अखेद सुबेद बतावैं । अलग अगोचर रूप महेस कौ जोगि-जति-मुनि ध्यान न पावैं ॥ आगम-निगम-पुरान सबै इतिहास सदा जिनके गुन गावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 1॥

Verse 2

सृजन सुपालन-लय-लीला हित जो बिधि-हरि-हर रूप बनावैं । एकहि आप बिचित्र अनेक सुबेष बनाइ कैं लीला रचावैं ॥ सुंदर सृष्टि सुपालन करि जग पुनि बन काल जु खाय पचावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 2॥

Verse 3

अगुन अनीह अनामय अज अविकार सहज निज रूप धरावैं । परम सुरम्य बसन-आभूषन सजि मुनि-मोहन रूप करावैं ॥ ललित ललाट बाल बिधु बिलसै रतन-हार उर पै लहरावैं। बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 3॥

Verse 4

अंग बिभूति रमाय मसानकी बिषमय भुजगनि कौं लपटावैं । नर-कपाल कर मुंडमाल गल, भालु-चरम सब अंग उढ़ावैं ॥ घोर दिगंबर, लोचन तीन भयानक देखि कैं सब थर्रावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 4॥

Verse 5

सुनतहि दीनकी दीन पुकार दयानिधि आप उबारन धावैं । पहुँच तहाँ अविलंब सुदारून मृत्युको मर्म बिदारि भगावैं ॥ मुनि मृकंडु-सुतकी गाथा सुचि अजहुँ बिग्यजन गाई सुनावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 5॥

Verse 6

चाउर चारि जो फूल धतूरके, बेलके पात औ पानि चढ़ावैं । गाल बजाय कै बोल जो ‘हरहर महादेव’ धुनि जोर लगावैं ॥ तिनहिं महाफल देय सदासिव सहजहि भुक्ति-मुक्ति सो पावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 6॥

Verse 7

बिनसि दोष दुख दुरित दैन्य दारिद्रय नित्य सुख-सांति मिलावैं । आसुतोष हर पाप-ताप सब निरमल बुद्धि-चित्त बकसावैं ॥ असरन-सरन काटि भवबंधन भव निज भवन भव्य बुलवावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 7॥

Verse 8

औढरदानि, उदार अपार जु नैकु-सी सेवा तें ढुरि जावैं । दमन असांति, समन सब संकट, बिरद बिचार जनहि अपनावैं ॥ ऐसे कृपालु कृपामय देव के क्यों न सरन अबहीं चलि जावैं । बड़भागी नर-नारि सोई जो साम्ब-सदाशिव कौं नित ध्यावैं ॥ 8॥

।। इति श्री शिवाष्टक सम्पूर्ण ।।

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The Above Recitation is by Ravindra Sathe.