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Shiva Chalisa

Chalisa · 1 verse · 3 min read

|| श्री शिव चालीसा ||

The Above Recitation is by Shekhar Sen and Ravindra Sathe. Note: The Above Shiv Chalisa is according to Geeta Press (Gorakhpur).

Verse 1

दोहा अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥ आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार। करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥ पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥ पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥ चौपाई जय शिवशंकर औढरदानी। जय गिरितनया मातु भवानी ॥१॥ सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर ॥२॥ सब उर-प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा स भर्ता अनुमन्ता ॥३॥ पराशक्ति-पति अखिल विश्वपति। परब्रह्मा परधाम परमगति ॥४॥ सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निज स्वरूप महिमामें स्थित रत ॥५॥ अन्ग भूति-भूषित श्मशानचर। भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर ॥६॥ वृषवाहन नन्दीगणनायक। अखिल विश्वके भाग्य-विधायक ॥७॥ व्याघ्र-चर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर ॥८॥ कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत ॥९॥ तनु कर्पूर-गौर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर सुशोभित ॥१०॥ भाल त्रिपुण्ड मुण्डमालाधर। गल रुद्राक्ष माल शोभाकर ॥११॥ विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी ॥१२॥ तुम हो नित्य दयाके सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर ॥१३॥ अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सबके मंगलकारी ॥१४॥ सती पार्वतीके प्राणेश्वर। स्कन्द गणेश-जनक शिव सुखकर ॥१५॥ हरि-हर एक रूप गुण-शीला। करत स्वामि-सेवककी लीला ॥१६॥ रहते दोउ पूजत पुजवावत। पूजा पद्धति सबन्हि सिखावत ॥१७॥ मारुति बन हरि सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही ॥१८॥ जग-हित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकण्ठ वर ॥१९॥ असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर ॥२०॥ ‘नमः शिवाय’ मन्त्र पञ्चाक्षर। जपत मिटत सब केश भयंकर ॥२१॥ जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परम हित ॥२२॥ श्रीकृष्णतप कीन्हों भारी। ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी ॥२३॥ अर्जुन संग लड़े किरात बन। दियो पाशुपत अस्त्र मुदित मन ॥२४॥ भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे ॥२५॥ शङ्खचूड़-जालन्धर मारे। दैत्य असँख्य प्राण हर तारे ॥२६॥ अन्धकको गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों ॥२७॥ तेहि संजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं ॥२८॥ अष्टमूर्ति पञ्चानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय ॥२९॥ भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा ॥३०॥ काशी मरत जन्तु अवलोकी। देत मुक्ति-पद करत अशोकी ॥३१॥ भक्त भगीरथकी रुचि राखी। जटा बसी गङ्गा सुर साखी ॥३२॥ रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी ॥३३॥ शिवरहस्य शिवज्ञान-प्रचारक। शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक ॥३४॥ इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर ॥३५॥ अति उदार करुणावरुणालय। हरण दैन्य दारिद्र्य-दुःख-भय ॥३६॥ तुहरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी ॥३७॥ बालक-वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलय शिवपदको पावहिं ॥३८॥ भेदशून्य तुम सबके स्वामी। सहज सुहृद सेवक-अनुगामी ॥३९॥ जो जन शरण तुहारी आवत। सकल दुरित तत्काल नशावत ॥४०॥ दोहा बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। गनौ न अघ, अघ जाति कछु, सब विधि करौ संभार तुम्हरो शील स्वाभव लखि, जो न शरण तव होय। तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नही कुभाग्य जन कोय दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करौ पाप सब क्षार कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करौ पवित्र। राखौ पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र

About this stotra

The Shiva Chalisa is a devotional hymn dedicated to Lord Shiva, consisting of 40 verses (Chalisa meaning forty in Hindi). This version is according to Geeta Press (Gorakhpur), one of the most widely accepted and authentic versions. It begins with a Doha (couplet) and then proceeds through 40 Chaupais (quatrains) praising the various attributes, forms, pastimes, and grace of Lord Shiva. The Chalisa recounts many episodes from Shiva’s mythology — the drinking of Halahala poison, his marriage to Parvati, his blessings to devotees like Arjuna, Markandeya, and Ravana — and is widely recited by devotees seeking peace, prosperity, and spiritual upliftment.