घमंड का सिर नीचा - Pride Comes Before a Fall
घमंड का सिर नीचा
Arrogance leads to humiliation - the humble rise while the proud fall.
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सतां वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः।
स विनाशमवाप्नोति घंटोष्ट्र इव सत्त्वरम्॥
सज्जन की सलाह न मानने वाला और दूसरों
से विशेष बनने करने का यत्न करने वाला मारा
जाता है
एक गांव में उज्वलक नाम का बढ़ई रहता था। वह बहुत ग़रीब था। ग़रीबी से तंग आकर वह गांव छोड़कर दूसरे गांव के लिये चल पड़ा। रास्ते में घना जंगल पड़ता था। वहां उसने देखा कि एक ऊँटनी प्रसवपीड़ा से तड़फड़ा रही है। ऊँटनी ने जब बच्चा दिया तो वह ऊँट के बच्चे और ऊँटनी को लेकर अपने घर आ गया। वहां घर के बाहर ऊँटनी को खूंटी से बांधकर वह उसके खाने के लियें पत्तों भरी शाखायें काटने वन में गया। ऊँटनी ने हरी-हरी कोमल कोंपले खाईं। बहुत दिन इसी तरह हरे-हरे पत्ते खाकर ऊंटनी स्वस्थ और पुष्ट हो गई। ऊँट का बच्चा भी बढ़कर जवान हो गया। बदई ने उसके गले में एक घंटा बांध दिया, जिससे वह कहीं खोया न जाय। दूर से ही उसकी आवाज़ सुनकर बढ़ई उसे घर लिवा लाता था। ऊँटनी के दूध से बढ़ई के बाल-बच्चे भी पलते थे। ऊँट भार ढोने के भी काम आने लगा।
उस ऊँट-ऊँटनी से ही उसका व्यापार चलता था। यह देख उसने एक धनिक से कुछ रुपया उधार लिया और गुर्जर देश में जाकर वहां से एक और ऊँटनी ले आया। कुछ दिनों में उसके पास अनेक ऊँट-ऊँटनियां हो गईं। उनके लिये रखवाला भी रख लिया गया। बढ़ई का व्यापार चमक उठा। घर में दूध की नदियाँ बहने लगीं।
शेष सब तो ठीक था-किन्तु जिस ऊँट के गले में घंटा बंधा था, वह बहुत गर्वित हो गया था। वह अपने को दूसरों से विशेष समझता था। सब ऊँट वन में पत्ते खाने को जाते तो वह सबको छोड़कर अकेला ही जंगल में घूमा करता था।
उसके घंटे की आवाज़ से शेर को यह पता लग जाता था कि ऊँट किधर है। सबने उसे मना किया कि वह गले से घंटा उतार दे, लेकिन वह नहीं माना।
एक दिन जब सब ऊँट वन में पत्ते खाकर तालाब से पानी पीने के बाद गांव की ओर वापिस पा रहे थे, तब वह सब को छोड़कर जंगल की सैर करने अकेला चल दिया। शेर ने भी घंटे की आवाज़ सुनकर उसका पीछा किया। और जब वह पास आया तो उस पर झपट कर उसे मार दिया।
बन्दर ने कहा, “तभी मैंने कहा था कि सज्जनों की बात अनसुनी करके जो अपनी ही करता है वह विनाश को निमंत्रण देता है।”
मगरमच्छ बोला-”तभी तो मैं तुझसे पूछता हूँ। तू सज्जन है, साधु है; किन्तु सच्चा साधु तो वही है जो अपकार करने वालों के साथ भी साधुता करे, कृतघ्नों को भी सच्ची राह दिखलाये। उपकारियों के साथ तो सभी साधु होते हैं।”
यह सुनकर बन्दर ने कहा-”तब मैं तुझे यही उपदेश देता हूँ कि तू जाकर उस मगर से, जिसने तेरे घर पर अनुचित अधिकार कर लिया है, युद्ध कर। नीति कहती है कि शत्रु बली है तो भेद-नीति से, नीच है तो दाम से, और समशक्ति है तो पराक्रम से उस पर विजय पाये।”
मगर ने पूछा-”यह कैसे?”
तब, बन्दर ने गीदड़-शेर और बाघ की यह कहानी सुनाई-