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समय का राग कुसमय की टर्र - Right Time, Wrong Tune

समय का राग कुसमय की टर्र

Timing is everything - the same action at the wrong time can lead to disaster.

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“स्वार्थभुत्सृज्य यो दंभी सत्यं ब्रूते सुमन्दधीः।

स स्वर्थद्भ्रश्यते नूनं युधिष्ठिर इवापरः”


अपने प्रयोजन से या केवल दंभ से सत्य

बोलने वाला व्यक्ति नष्ट हो जाता है।


युधिष्ठिर नाम का कुम्हार एक बार टूटे हुए घड़े के नुकीले ठीकरे से टकरा कर गिर गया। गिरते ही वह ठीकरा उसके माथे में घुस गया। खून बहने लगा। घाव गहरा था, दवा-दारू से भी ठीक न हुआ। घाव बढ़ता ही गया। कई महीने ठीक होने में लग गये। ठीक होने पर भी उसका निशान माथे पर रह गया।

कुछ दिन बाद अपने देश में दुर्भिक्ष पड़ने पर वह एक दूसरे देश में चला गया। वहाँ वह राजा के सेवकों में भर्ती हो गया। राजा ने एक दिन उसके माथे पर घाव के निशान देखे तो समझा कि यह अवश्य कोई वीर पुरुष होगा, जो लड़ाई में शत्रु का सामने से मुक़ाबिला करते हुए घायल हो गया होगा। यह समझ उसने उसे अपनी सेना में ऊँचा पद दे दिया। राजा के पुत्र व अन्य सेनापति इस सम्मान को देखकर जलते थे, लेकिन राजभय से कुछ कह नहीं सकते थे।

कुछ दिन बाद उस राजा को युद्ध-भूमि में जाना पड़ा। वहाँ जब लड़ाई की तैयारियाँ हो रही थीं, हाथियों पर हौदे डाले जा रहे थे, घोड़ों पर काठियां चढ़ाई जा रही थीं, युद्ध का बिगुल सैनिकों को युद्ध-भूमि के लिये तैयार होने का संदेश दे रहा था-राजा ने प्रसंगवश युधिष्ठिर कुंभकार से पूछा-”वीर! तेरे माथे पर यह गहरा घाव किस संग्राम में कौन से शत्रु का सामना करते हुए लगा था?”

कुंभकार ने सोचा कि अब राजा और उसमें इतनी निकटता हो चुकी है कि राजा सच्चाई जानने के बाद भी उसे मानता रहेगा। यह सोच उसने सच बात कह दी कि-”यह घाव हथियार का घाव नहीं है। मैं तो कुंभकार हूं। एक दिन शराब पीकर लड़खड़ाता हुआ जब मैं घर से निकला तो घर में बिखरे पड़े घड़ों के ठीकरों से टकरा कर गिर पड़ा। एक नुकीला ठीकरा माथे में गड़ गया। यह निशान उसका ही है।”

राजा यह बात सुनकर बहुत लज्जित हुआ, और क्रोध से कांपते हुए बोला-”तूने मुझे ठगकर इतना ऊँचा पद पालिया। अभी मेरे राज्य से निकल जा।” कुंभकार ने बहुत अनुनय विनय की कि-”मैं युद्ध के मैदान में तुम्हारे लिये प्राण दे दूंगा, मेरा युद्ध-कौशल तो देख लो।” किन्तु, राजा ने एक बात न सुनी। उसने कहा कि भले ही तुम सर्वगुणसम्पन्न हो, शूर हो, पराक्रमी हो, किन्तु हो तो कुंभकार ही। जिस कुल में तेरा जन्म हुआ है वह शूरवीरों का नहीं है। तेरी अवस्था उस गीदड़ की तरह है, जो शेरों के बच्चों में पलकर भी हाथी से लड़ने को तैयार न हुआ था”।

युधिष्ठिर कुंभकार ने पूछा-”यह किस तरह?”

तब राजा ने सिंह-शृंगालपुत्र की कहानी इस प्रकार सुनाई-