स्वार्थसिद्धि परम लक्ष्य
स्वार्थसिद्धि परम लक्ष्य!
Self-interest is the ultimate goal - a pragmatic lesson about the nature of alliances.
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अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः।
स्वार्थमभ्युद्धरेस्प्राज्ञः स्वार्थभ्रंशो हि मूर्खता।।
बुद्धमानी इसी में है कि स्वार्थ सिद्धि के लिये
मानापमान की चिन्ता छोड़ी जाय।
वरुण पर्वत के पास एक जङ्गल में मन्दविष नाम का बूढ़ा साँप रहता था। उसे बहुत दिनों से कुछ खाने को नहीं मिला था। बहुत भाग-दौड़ किये बिना खाने का उसने यह उपाय किया कि वह एक तालाब के पास चला गया। उसमें सैंकड़ों मेंढक रहते थे। तालाब के किनारे जाकर वह बहुत उदास और विरक्त-सा मुख बना कर बैठ गया। कुछ देर बाद एक मेंढक ने तालाब से निकल कर पूछा-”मामा! क्या बात है, आज कुछ खाते-पीते नहीं हो। इतने उदास से क्यों हो?”
साँप ने उत्तर दिया-”मित्र! मेरे उदास होने का विशेष कारण है। मेरे यहाँ आने का भी वही कारण है।”
मेंढक ने जब कारण पूछा तो साँप ने झूठमूठ एक कहानी बना ली। वह बोला-”बात यह है कि आज सुबह मैं एक मेंढक को मारने के लिए जब आगे बढ़ा तो मेंढक वहाँ से उछल कर कुछ ब्राह्मणों के बीच में चला गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे वहाँ गया। वहाँ जाकर एक ब्राह्मण-पुत्र का पैर मेरे शरीर पर पड़ गया। तब मैंने उसे डस लिया। वह ब्राह्मण-पुत्र वहीं मर गया। उसके पिता ब्राह्मण ने मुझे क्रोध से जलते हुए यह शाप दिया कि तुझे मेंढकों का वाहक बन कर उन्हें सैर कराना होगा। तेरी सेवा से प्रसन्न होकर जो कुछ वे तुझे देंगे, वही तेरा आहार होगा। स्वतन्त्र रूप से तू कुछ भी खा नहीं सकेगा। यहाँ पर मैं तुम्हारा वाहक बनकर ही आया हूँ!”
उस मेंढक ने यह बात अपने साथी मेंढकों को भी कह दी। सब मेंढक बड़े खुश हुए। उन्होंने इसका वृत्तान्त अपने राजा ‘जलपाद’ को भी सुनाया। जलपाद ने अपने मन्त्रियों से सलाह करके यही निश्चय किया कि साँप को वाहक बनाकर उसकी सेवा से लाभ उठाया जाय। जलपाद के साथ सभी मेंढक साँप की पीठ पर सवार हो गए। जिनको उसकी पीठ पर स्थान नहीं मिला उन्होंने साँप के पीछे गाड़ी लगा कर उसकी सवारी की।
सांप पहले तो बड़ी तेज़ी से दौड़ा, बाद में उसकी चाल धीमी पड़ गई। जलपाद के पूछने पर इसका कारण यह बतलाया “आज भोजन न मिलने से मेरी शक्ति क्षीन हो गई है, क़दम नहीं उठते।” यह सुन कर जलपाद ने उसे छोटे-छोटे मेंढकों को खाने की आज्ञा दे दी।
सांप ने कहा-”मेंढक महाराज! आपकी सेवा से पाये पुरस्कार को भोग कर ही मेरी तृप्ति होगी, यही ब्राह्मण का अभिशाप है। इसलिये आपकी आज्ञा से मैं बहुत उपकृत हुआ हूँ।” जलपाद सांप की बात से बहुत प्रसन्न हुआ।
थोड़ी देर बाद एक और काला सांप उधर से गुज़रा। उसने मेंढकों को सांप की सवारी करते देखा तो आश्चर्य में डूब गया। आश्चर्यान्वित होकर वह मन्दविष से बोला-”भाई! जो हमारा भोजन है, उसे ही तुम पीठ पर सवारी करा रहे हो। यह तो स्वभाव-विरुद्ध बात है। मन्दविष ने उत्तर दिया-”मित्र! यह बात मैं भी जानता हूँ, किन्तु समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।”
मन्दविष ने अनुकूल अवसर पाकर धीरे-धीरे सब मेंढकों को खा लिया। मेंढकों का वंशनाश ही हो गया।
वायसराज मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को धन्यवाद देते हुए कहा-”मित्र, आप बड़े पुरुषार्थी और दूरदर्शी हैं। एक कार्य को प्रारंभ करके उसे अन्त तक निभाने की आपकी क्षमता अनुपम है। संसार में कई तरह के लोग हैं। नीचतम प्रवृत्ति के वे हैं जो विघ्न-भय से किसी भी कार्य का आरंभ नहीं करते, मध्यम वे हैं जो विघ्न-भय से हर काम को बीच में छोड़ देते हैं, किन्तु उत्कृष्ट वही है जो सैंकड़ों विघ्नों के होते हुए भी आरंभ किये गये काम को बीच में नहीं छोड़ते। आपने मेरे शत्रुओं का समूल नाश करके उत्तम कार्य किया है।”
स्थिरजीवी ने उत्तर दिया-”महाराज! मैंने अपना धर्म पालन किया। दैव ने आपका साथ दिया। पुरुषार्थ बहुत बड़ी वस्तु है, किन्तु दैव अनुकूल न हो तो पुरुषार्थ भी फलित नहीं होता। आपको अपना राज्य मिल गया। किन्तु स्मरण रखिये, राज्य क्षणस्थायी होते हैं। बड़े-बड़े विशाल राज्य क्षणों में बनते और मिटते रहते हैं। शाम के रंगीन बादलों की तरह उनकी आभा भी क्षणजीवी होती है। इसलिये राज्य के मद में आकर अन्याय नहीं करना, और न्याय से प्रजा का पालन करना। राजा प्रजा का स्वामी नहीं, सेवक होता है।”
इसके बाद स्थिरजीवी की सहायता से मेघवर्ण बहुत वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य करता रहा।
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