शत्रु का शत्रु मित्र
शत्रु का शत्रु मित्र
The enemy of my enemy is my friend - strategic alliances can defeat greater foes.
2 min read
शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम्
परस्पर लड़ने वाले शत्रु भी हितकर होते हैं
एक गाँव में द्रोण नाम का ब्राह्मण रहता था। भिक्षा माँग कर उसकी जीविका चलती थी। सर्दी-गर्मी रोकने के लिये उसके पास पर्याप्त वस्त्र भी नहीं थे। एक बार किसी यजमान ने ब्राह्मण पर दया करके उसे बैलों की जोड़ी दे दी। ब्राह्मण ने उनका भरन-पोषण बड़े यत्न से किया। आस-पास से घी-तेल-अनाज माँगकर भी उन बैलों को भरपेट खिलाता रहा। इससे दोनों बैल खूप मोटे ताज़े हो गये। उन्हें देखकर एक चोर के मन में लालच आ गया। उसने चोरी करके दोनों बैलों को भगा लेजाने का निश्चय कर लिया। इस निश्चय के साथ जब वह अपने गाँव से चला तो रास्ते में उसे लंबे लंबे दांतों, लाल आँखों, सूखे बालों और उभरी हुई नाक वाला एक भयङ्कर आदमी मिला।
उसे देखकर चोर ने डरते-डरते पूछा-”तुम कौन हो?”
उस भयङ्कर आकृति वाले आदमी ने कहा-”मैं ब्रह्मराक्षस हूँ; तुम कौन हो, कहाँ जा रहे हो?”
चोर ने कहा-”मैं क्रूरकर्मा चोर हूँ, पास वाले ब्राह्मण के घर से बैलों की जोड़ी चुराने जा रहा हूँ।”
राक्षस ने कहा-”मित्र! पिछले छः दिन से मैंने कुछ भी नहीं खाया। चलो, आज उस ब्राह्मण को मारकर ही भूख मिटाऊँगा। हम दोनों एक ही मार्ग के यात्री हैं। चलो, साथ-साथ चलें।”
शाम को दोनों छिपकर ब्राह्मण के घर में घुस गये। ब्राह्मण के शैयाशायी होने के बाद राक्षस जब उसे खाने के लिये आगे बढ़ने लगा तो चोर ने कहा-”मित्र! यह बात न्यायानुकूल नहीं है। पहले मैं बैलों की जोड़ी चुरा लूँ, तब तू अपना काम करना।”
राक्षस ने कहा-”कभी बैलों को चुराते हुए खटका हो गया और ब्राह्मण जाग पड़ा तो अनर्थ हो जायगा, मैं भूखा ही रह जाऊँगा। इसलिये पहले मुझे ब्राह्मण को खा लेने दे, बाद में तुम चोरी कर लेना।”
चोर ने उत्तर दिया-”ब्राह्मण की हत्या करते हुए यदि ब्राह्मण बच गया और जागकर उसने रखवाली शुरू कर दी तो मैं चोरी नहीं कर सकूँगा। इसलिये पहले मुझे अपना काम कर लेने दे।”
दोनों में इस तरह की कहा-सुनी हो ही रही थी कि शोर सुनकर ब्राह्मण जाग उठा। उसे जागा हुआ देख चोर ने ब्राह्मण से कहा-”ब्राह्मण! यह राक्षस तेरी जान लेने लगा था, मैंने इसके हाथ से तेरी रक्षा कर दी।”
राक्षस बोला-”ब्राह्मण! यह चोर तेरे बैलों को चुराने आया था, मैंने तुझे बचा लिया।”
इस बातचीत में ब्राह्मण सावधान हो गया। लाठी उठाकर वह अपनी रक्षा के लिये तैयार हो गया। उसे तैयार देखकर दोनों भाग गये।
उसकी बात सुनने के बाद अरिमर्दन ने फिर दूसरे मन्त्री ‘प्राकारकर्ण’ से पूछा-”सचिव! तुम्हारी क्या सम्मति है?”
प्राकारकर्ण ने कहा-”देव! यह शरणागत व्यक्ति अवध्य ही है। हमें अपने परस्पर के मर्मों की रक्षा करनी चाहिये। जो ऐसा नहीं करते वे वल्मीक में बैठे साँप की तरह नष्ट हो जाते हैं।”
अरिमर्दन ने पूछा-”किस तरह?”
प्राकारकर्ण ने तब वल्मीक और साँप की यह कहानी सुनाई-