Skip to content
14

बोलने वाली गुफा

बोलने वाली गुफा

A jackal who questions a cave that speaks discovers a lion's trap - wisdom lies in caution.

4 min read

“अनागतं यः कुरुते स शोभते”


आने वाले संकट को देखकर अपना

भावी कार्यक्रम निश्चय करने वाला

सुखी रहता है


एक जंगल में खर-नखर नाम का शेर रहता था। एक बार इधर-उधर बहुत दौड़-धूप करने के बाद उसके हाथ कोई शिकार नहीं आया। भूख-प्यास से उसका गला सूख रहा था। शाम होने पर उसे एक गुफा दिखाई दी। वह उस गुफा के अन्दर घुस गया और सोचने लगा-”रात के समय रहने के लिये इस गुफा में कोई जानवर अवश्य आयगा, उसे मारकर भूख मिटाऊँगा। तब तक इस गुफा में ही छिपकर बैठता हूँ।”

इस बीच उस गुफा का अधिवासी दुधिपुच्छ नाम का गीदड़ वहां आ गया। उसने देखा, गुफा के बाहिर शेर के पद-चिन्हों की पंक्ति है। पद-चिन्ह गुफा के अन्दर तो गये थे, लेकिन बाहिर नहीं आये थे। गीदड़ ने सोचा-”मेरी गुफा में कोई शेर गया अवश्य है, लेकिन वह बाहिर आया या नहीं, इसका पता कैसे लगाया जाय।” अन्त में उसे एक उपाय सूझ गया। गुफा के द्वार पर बैठकर वह किसी को संबोधन करके पुकारने लगा-”मित्र! मैं आ गया हूँ। तूने मुझे वचन दिया था कि मैं आऊँगा तो तू मुझसे बात करेगा। अब चुप क्यों है?”

गीदड़ की पुकार सुनकर शेर ने सोचा, ‘शायद यह गुफा गीदड़ के आने पर खुद बोलती है और गीदड़ से बात करती है। जो आज मेरे डर से चुप है। इसकी चुप्पी से गीदड़ को मेरे यहां होने का सन्देह हो जायगा। इसलिये मैं स्वयं बोलकर गीदड़ को जवाब देता हूँ।’ यह सोचकर शेर स्वयं गर्ज उठा।

शेर की गर्जना सुनकर गुफा भयङ्कर आवाज से गूंज उठी। गुफा से दूर के जानवर भी डर से इधर-उधर भागने लगे। गीदड़ भी गुफा के अन्दर से आती शेर की आवाज सुनकर वहां से भाग गया। अपनी मूर्खता से शेर ने स्वयं ही उस गीदड़ को भगा दिया जिसे पास लाकर वह खाना चाहता था। उसने यह न सोचा कि गुफा कभी बोल नहीं सकती। और गुफा का बोल सुनकर गीदड़ का संदेह पक्का हो जायगा।


रक्ताक्ष ने उक्त कहानी कहने के बाद अपने साथियों से कहा कि ऐसे मूर्ख समुदाय में रहना विपत्ति को पास बुलाना है। उसी दिन परिवारसमेत रक्ताक्ष वहाँ से दूर किसी पर्वत-कन्दरा में चला गया।

रक्ताक्ष के विदा होने पर स्थिरजीवी बहुत प्रसन्न होकर सोचने लगा-”यह अच्छा ही हुआ कि रक्ताक्ष चला गया। इन मूर्ख मन्त्रियों में अकेला वही चतुर और दूरदर्शी था।”

रक्ताक्ष के जाने के बाद स्थिरजीवी ने उल्लुओं के नाश की तैयारी पूरे ज़ोर से शुरू करदी। छोटी-छोटी लकड़ियाँ चुनकर वह पर्वत की गुफा के चारों ओर रखने लगा। जब पर्याप्त लकड़ियाँ एकत्र हो गईं तो वह एक दिन सूर्य के प्रकाश में उल्लुओं के अन्धे होने के बाद अपने पहले मित्र राजा मेघवर्ण के पास गया, और बोला-”मित्र! मैंने शत्रु को जलाकर भस्म कर देने की पूरी योजना तैयार करली है। तुम भी अपनी चोंचों में एक-एक जलती लकड़ी लेकर उलूकराज के दुर्ग के चारों ओर फैला दो। दुर्ग जलकर राख हो जायगा। शत्रुदल अपने ही घर में जलकर नष्ट हो जायगा।”

यह बात सुनकर मेघवर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्थिरजीवी से कहा-”महाराज, कुशल-क्षेम से तो रहे, बहुत दिनों के बाद आपके दर्शन हुए हैं।”

स्थिरजीवी ने कहा-”वत्स! यह समय बातें करने का नहीं, यदि किसी शत्रु ने वहाँ जाकर मेरे यहाँ आने की सूचना दे दी तो बना-बनाया खेल बिगड़ जाएगा। शत्रु कहीं दूसरी जगह भाग जाएगा। जो काम शीघ्रता से करने योग्य हो, उसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए। शत्रुकुल का नाश करके फिर शांति से बैठ कर बातें करेंगे।

मेघवर्ण ने भी यह बात मान ली। कौवे सब अपनी चोंचों में एक-एक जलती हुई लकड़ी लेकर शत्रु-दुर्ग की ओर चल पड़े और वहाँ जाकर लकड़ियाँ दुर्ग के चारों ओर फैला दी। उल्लुओं के घर जलकर राख हो गए और सारे उल्लू अन्दर ही अन्दर तड़प कर मर गए।

इस प्रकार उल्लुओं का वंशनाश करके मेघवर्ण वायसराज फिर अपने पुराने पीपल के वृक्ष पर आ गया। विजय के उपलक्ष में सभा बुलाई गई। स्थिरजीवी को बहुत सा पुरस्कार देकर मेघवर्ण ने उस से पूछा-”महाराज! आपने इतने दिन शत्रु के दुर्ग में किस प्रकार व्यतीत किये? शत्रु के बीच रहना तो बड़ा संकटापन्न है। हर समय प्राण गले में अटके रहते हैं।”

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया-”तुम्हारी बात ठीक है, किन्तु मैं तो आपका सेवक हूँ। सेवक को अपनी तपश्चर्या के अंतिम फल का इतना विश्वास होता है कि वह क्षणिक कष्टों की चिन्ता नहीं करता। इसके अतिरिक्त, मैंने यह देखा कि तुम्हारे प्रतिपक्षी उलूकराज के मन्त्री महामूर्ख हैं। एक रक्ताक्ष ही बुद्धिमान था, वह भी उन्हें छोड़ गया। मैंने सोचा, यही समय बदला लेने का है। शत्रु के बीच विचरने वाले गुप्तचर को मान-अपमान की चिन्ता छोड़नी ही पड़ती है। वह केवल अपने राजा का स्वार्थ सोचता है। मान-मर्यादा की चिन्ता का त्याग करके वह स्वार्थ-साधन के लिये चिन्ताशील रहता है। अवसर देखकर उसे शत्रु को भी पीठ पर उठाकर चलना चाहिए, जैसे काले नाग ने मेंढकों को पीठ पर उठाया था, और सैर कराई थी।”

मेघवर्ण ने पूछा-”वह कैसे?”

स्थिरजीवी ने तब सांप और मेंढकों की यह कहानी सुनाई-