Skip to content
4

बिल्ली का न्याय

बिल्ली का न्याय

A cat who acts as a judge between two quarreling parties eats both of them - beware of biased mediators.

3 min read

“सुद्रमर्थपति प्राप्य न्यायान्वेषणतत्परौ।

उभावपिं क्षयं प्राप्तौ पुरा शशकपिंजलाै॥”


नीच और लोभी को पंच बनाने वाले दोनों

पक्ष नष्ट हो जाते हैं।


एक जंगल के जिस वृत की शाखा पर मैं रहता था, उसके नीचे के तने में एक खोल के अन्दर कपिंजल नाम का तीतर भी रहता था। शाम को हम दोनों में खूब बातें होती थीं। हम एक-दूसरे को दिन भर के अनुभव सुनाते थे और पुराणों की कथायें कहते थे।

एक दिन वह तीतर अपने साथियों के साथ बहुत दूर के खेत में धान की नई-नई कोपलें खाने चला गया। बहुत रात बीते भी जब वह नहीं आया तो मैं बहुत चिन्तित होने लगा। मैंने सोचा-किसी बधिक ने जाल में न बाँध लिया हो, या किसी जंगली बिल्ली ने न खा लिया हो। बहुत रात बीतने के बाद उस वृक्ष के खाली पड़े खोल में ‘शीघ्रगो’ नाम का खरगोश घुस आया। मैं भी तीतर के वियोग में इतना दुःखी था कि उसे रोका नहीं।

दूसरे दिन कपिंजल अचानक ही आ गया। धान की नई-नई कोंपले खाने के बाद वह खूब मोटा-ताज़ा हो गया था। अपनी खोल में आने पर उसने देखा कि वहाँ एक खरगोश बैठा है। उसने खरगोश को अपनी जगह खाली करने को कहा। खरगोश भी तीखे स्वभाव का था; बोला-”यह घर अब तेरा नहीं है। वापी, कूप, तालाब और वृक्ष के घरों का यही नियम है कि जो भी उनमें बसेरा करले उसका ही वह घर हो जाता है। घर का स्वामित्व केवल मनुष्यों के लिये होता है, पक्षियों के लिये गृह-स्वामित्व का कोई विधान नहीं है।”

झागड़ा बढ़ता गया। अन्त में, कपिंजल ने किसी भी तीसरे पंच से इसका निर्णय करने की बात कही। उनकी लड़ाई और समझौते की बातचीत को एक जंगली बिल्ली सुन रही थी। उसने सोचा, मैं ही पंच बन जाऊँ तो कितना अच्छा है; दोनों को मार कर खाने का अवसर मिल जायगा।

यह सोच हाथ में माला लेकर सूर्य की ओर मुख कर के नदी के किनारे कुशासन बिछाकर वह आँखें मूंद बैठ गयी और धर्म का उपदेश करने लगी। उसके धर्मोपदेश को सुनकर खरगोश ने कहा-”यह देखो! कोई तपस्वी बैठा है, इसी को पंच बनाकर पूछ लें।” तीतर बिल्ली को देखकर डर गया; दूर से बोला-”मुनिवर! तुम हमारे झगड़े का निपटारा कर दो। जिसका पक्ष धर्म-विरुद्ध होगा उसे तुम खा लेना।” यह सुन बिल्ली ने आँख खोली और कहा- “राम-राम! ऐसा न कहो। मैंने हिंसा का नारकीय मार्ग छोड़ दिया है। अतः मैं धर्म-विरोधी पक्ष की भी हिंसा नहीं करूँगी। हाँ, तुम्हारा निर्णय करना मुझे स्वीकार है। किन्तु, मैं वृद्ध हूँ; दूर से तुम्हारी बात नहीं सुन सकती, पास आकर अपनी बात कहो।” बिल्ली की बात पर दोनों को विश्वास हो गया; दोनों ने उसे पंच मान लिया, और उसके पास आ गये। उसने भी झपट्टा मारकर दोनों को एक साथ ही पंजों में दबोच लिया।

इसी कारण, मैं कहता हूँ कि नीच और व्यसनी को राजा बनाओगे तो तुम सब नष्ट हो जाओगे। इस दिवान्ध उल्लू को राजा बनाओगे तो वह भी रात के अंधेरे में तुम्हारा नाश कर देगा।”


कौवे की बात सुनकर सब पक्षी उल्लू को राज-मुकुट पहनाये बिना चले गये। केवल अभिषेक की प्रतीक्षा करता हुआ उल्लू उसकी मित्र कृकालिका और कौवा रह गये। उल्लू ने पूछा-”मेरा अभिषेक क्यों नहीं हुआ?”

कृकालिका ने कहा-”मित्र! एक कौवे ने आकर रंग में भंग कर दिया। शेष सब पक्षी उड़कर चले गये हैं, केवल वह कौवा ही यहाँ बैठा है।”

तब, उल्लू ने कौवे से कहा-”दुष्ट कौवे! मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था जो तूने मेरे कार्य में विघ्न डाल दिया। आज से मेरा-तेरा वंशपरंपरागत वैर रहेगा।”


यह कहकर उल्लू वहाँ से चला गया। कौवा बहुत चिन्तित हुआ वहीं बैठा रहा। उसने सोचा-”मैंने अकारण ही उल्लू से वैर मोल ले लिया। दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करना और कटु सत्य कहना भी दुःखप्रद होता है।”

यही सोचता-सोचता वह कौवा वहाँ से आ गया। तभी से कौओं और उल्लुओं में स्वाभाविक वैर चला आता है।


कहानी सुनने के बाद मेघवर्ण ने पूछा-”अब हमें क्या करना चाहिये?”

स्थिरजीवी ने धीरज बँधाते हुए कहा-”हमें छल द्वारा शत्रु पर विजय पानी चाहिये। छल से अत्यन्त बुद्धिमान् ब्राह्मण को भी मूर्ख बनाकर धूर्त्तों ने जीत लिया था।”

मेघवर्ण ने पूछा-”कैसे?”

स्थिरजीवी ने तब धूर्त्तों और ब्राह्मण की यह कथा सुनाई-