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जैसे को तैसा

जैसे को तैसा

A story from Prathama Tantra

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तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः।

राजंस्तत्र हरेच्छयेनो बालकं नात्र संशयः॥


जहां मन भर लोहे की तराज़ू को चूहे खा

जाएं वहां की चील भी बच्चे को उठा कर

ले जा सकती है।


एक स्थान पर जीर्णधन नाम का बनिये का लड़का रहता था। धन की खोज में उसने परदेश जाने का विचार किया। उसके घर में विशेष सम्पत्ति तो थी नहीं, केवल एक मन भर भारी लोहे की तराज़ू थी। उसे एक महाजन के पास धरोहर रखकर वह विदेश चला गया। विदेश से वापिस आने के बाद उसने महाजन से अपनी धरोहर वापिस मांगी। महाजन ने कहा-”वह लोहे की तराज़ू तो चूहों ने खा ली।”

बनिये का लड़का समझ गया कि वह उस तराज़ू को देना नहीं चाहता। किन्तु अब उपाय कोई नहीं था। कुछ देर सोचकर उसने कहा-”कोई चिन्ता नहीं। चूहों ने खा डाली तो चूहों का दोष है, तुम्हारा नहीं। तुम इसकी चिन्ता न करो।”

थोड़ी देर बाद उसने महाजन से कहा-”मित्र! मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ। तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दो, वह भी नहा आयेगा।”

महाजन बनिये की सज्जनता से बहुत प्रभावित था, इसलिए उसने तत्काल अपने पुत्र को उसके साथ नदी-स्नान के लिए भेज दिया।

बनिये ने महाजन के पुत्र को वहाँ से कुछ दूर ले जाकर एक गुफा में बन्द कर दिया। गुफा के द्वार पर बड़ी सी शिला रख दी, जिससे वह बचकर भाग न पाये। उसे वहाँ बंद करके जब वह महाजन के घर आया तो महाजन ने पूछा-”मेरा लड़का भी तो तेरे साथ स्नान के लिए गया था, वह कहाँ है?”

बनिये ने कहा-”उसे चील उठा कर ले गई है।”

महाजन-”यह कैसे हो सकता है? कभी चील भी इतने बड़े बच्चे को उठा कर ले जा सकती है?”

बनिया-”भले आदमी! यदि चील बच्चे को उठाकर नहीं ले जा सकती तो चूहे भी मन भर भारी तराज़ू को नहीं खा सकते। तुझे बच्चा चाहिए तो तराज़ू निकाल कर दे दे।”

इसी तरह विवाद करते हुए दोनों राजमहल में पहुँचे। वहाँ न्यायाधिकारी के सामने महाजन ने अपनी दुःख-कथा सुनाते हुए कहा कि, “इस बनिये ने मेरा लड़का चुरा लिया है।”

धर्माधिकारी ने बनिये से कहा-”इसका लड़का इसे दे दो।”


बनिया बोला-”महाराज! उसे तो चील उठा ले गई है।”

धर्माधिकारी-”क्या कभी चील भी बच्चे को उठा ले जा सकती है?”

बनिया-”प्रभु! यदि मन भर भारी तराज़ू को चूहे खा सकते हैं तो चील भी बच्चे को उठाकर ले जा सकती है।”

धर्माधिकारी के प्रश्न पर बनिये ने अपनी तराज़ू का सब वृत्तान्त कह सुनाया।


कहानी कहने के बाद दमनक को करटक ने फिर कहा कि-”तूने भी असम्भव को सम्भव बनाने का यत्न किया है। तूने स्वामी का हितचिन्तक होते अहित कर दिया है। ऐसे हितचिन्तक मूर्ख मित्रों की अपेक्षा अहितचिन्तक वैरी अच्छे होते हैं। हितचिन्तक मूर्ख बन्दर ने हितसंपादन करते-करते राजा का खून ही कर दिया था।”

दमनक ने पूछा-”कैसे?”

करटक ने तब बन्दर और राजा की यह कहानी सुनाई-