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कुसङ्ग का फल

कुसङ्ग का फल

A story from Prathama Tantra

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‘नह्यविज्ञातशीलस्य प्रदातव्य प्रतिश्रयः’


अज्ञात या विरोधी प्रवृत्ति के व्यक्ति को आश्रय

नहीं देना चाहिए।


एक राजा के शयन-गृह में शैया पर बिछी सफ़ेद चादरों के बीच एक मन्दविसर्पिणी सफेद जूँ रहती थी। एक दिन इधर-उधर घूमता हुआ एक खटमल भी वहाँ आ गया। उस खटमल का नाम था ‘अग्निमुख’।

अग्निमुख को देखकर दुःखी जूँ ने कहा-”हे अग्निमुख! तू यहाँ अनुचित स्थान पर आ गया है। इस से पूर्व कि कोई आकर तुझे देखे, यहाँ से भाग जा।”

खटमल बोला-”भगवती! घर आये दुष्ट व्यक्ति का भी इतना अनादर नहीं किया जाता, जितना तू मेरा कर रही है। उससे भी कुशल-क्षेम पूछा जाता है। घर बनाकर बैठने वालों का यही धर्म है। मैंने आज तक अनेक प्रकार का कटु-तिक्त-कषाय अम्ल रस का खून पिया है; केवल मीठा खून नहीं पिया। आज इस राजा के मीठे खून का स्वाद लेना चाहता हूँ। तू तो रोज़ ही मीठा खून पीती है। एक दिन मुझे भी उसका स्वाद लेने दे।”

जूँ बोली-”अग्निमुख! मैं राजा के सो जाने के बाद उस का खून पीती हूँ। तू बड़ा चंचल है, कहीं मुझ से पहले ही तूने खून पीना शुरू कर दिया तो दोनों मारे जायँगे। हाँ, मेरे पीछे रक्तपान करने की प्रतिज्ञा करे तो एक रात भले ही ठहर जा।”

खटमल बोला-”भगवती! मुझे स्वीकार है। मैं तब तक रक्त नहीं पीऊँगा जब तक तू नहीं पीलेगी। वचन भंग करूँ तो मुझे देव-गुरु का शाप लगे।”

इतने में राजा ने चादर ओढ़ ली। दीपक बुझा दिया। खटमल बड़ा चंचल था। उसकी जीभ से पानी निकल रहा था। मीठे खून के लालच से उसने जूँ के रक्तपान से पहले ही राजा को काट लिया। जिसका जो स्वभाव हो, वह उपदेशों से नहीं छूटता। अग्नि अपनी जलन और पानी अपनी शीतलता के स्वभाव को कहाँ छोड़ सकती है? मर्त्य जीव भी अपने स्वभाव के विरुद्ध नहीं जा सकते।

अग्निमुख के पैने दांतों ने राजा को तड़पा कर उठा दिया। पलंग से नीचे कूद कर राजा ने सन्तरी से कहा-”देखो, इस शैया में खटमल या जूँ अवश्य है। इन्हीं में से किसी ने मुझे काटा है।” सन्तरियों ने दीपक जला कर चादर की तहें देखनी शुरू कर दीं। इस बीच खटमल जल्दी से भागकर पलंग के पावों के जोड़ में जा छिपा। मन्दविसर्पिणी जूँ चादर की तह में ही छिपी थी। सन्तरियों ने उसे देखकर पकड़ लिया और मसल डाला।”


दमनक शेर से बोला-”इसीलिये मैं कहता हूँ कि संजीवक को मार दो, अन्यथा वह आपको मार देगा, अथवा उसकी संगति से आप जब स्वभाव-विरुद्ध काम करेंगे, अपनों को छोड़कर परायों को अपनायेंगे, तो आप पर वही आपत्ति आजायगी जो ‘चंडरव’ पर आई थी।

पिंगलक ने पूछा-”कैसे?”

दमनक ने कहा-”सुनो-