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करने से पहले सोचो

करने से पहले सोचो

A story from Prathama Tantra

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‘उपायं चिन्तयेत्प्राज्ञस्तथाऽपायं च चिन्तयेत्’


उपाय की चिन्ता के साथ, तज्जन्य अपाय या

दुष्परिणाम की भी चिन्ता कर लेनी चाहिए।


जंगल के एक बड़े वट-वृक्ष की खोल में बहुत से बगले रहते थे। उसी वृक्ष की जड़ में एक साँप भी रहता था। वह बगलों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था।

एक बगला साँप द्वारा बार-बार बच्चों के खाये जाने पर बहुत दुःखी और विरक्त सा होकर नदी के किनारे आ बैठा। उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे। उसे इस प्रकार दुःखमग्न देखकर एक केकड़े ने पानी से निकल कर उसे कहा :-“मामा! क्या बात है, आज रो क्यों रहे हो?”

बगले ने कहा-”भैया! बात यह है कि मेरे बच्चों को साँप बार-बार खा जाता है। कुछ उपाय नहीं सूझता, किस प्रकार साँप का नाश किया जाय। तुम्हीं कोई उपाय बताओ।”


केकड़े ने मन में सोचा, ‘यह बगला मेरा जन्मवैरी है, इसे ऐसा उपाय बताऊंगा, जिससे साँप के नाश के साथ-साथ इसका भी नाश हो जाय।’ यह सोचकर वह बोला-

“मामा! एक काम करो, मांस के कुछ टुकड़े लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो। इसके बाद बहुत से टुकड़े उस बिल से शुरू करके साँप के बिल तक बखेर दो। नेवला उन टुकड़ों को खाता-खाता साँप के बिल तक आ जायगा और वहाँ साँप को भी देखकर उसे मार डालेगा।”

बगले ने ऐसा ही किया। नेवले ने साँप को तो खा लिया किन्तु साँप के बाद उस वृक्ष पर रहने वाले बगलों को भी खा डाला।

बगले ने उपाय तो सोचा, किन्तु उसके अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे। अपनी मूर्खता का फल उसे मिल गया। पाप-बुद्धि ने भी उपाय तो सोचा, किन्तु अपाय नहीं सोचा।”


करटक ने कहा-”इसी तरह दमनक! तू ने भी उपाय तो किया, किन्तु अपाय की चिन्ता नहीं की। तू भी पाप-बुद्धि के समान ही मूर्ख है। तेरे जैसे पाप-बुद्धि के साथ रहना भी दोषपूर्ण है। आज से तू मेरे पास मत आना। जिस स्थान पर ऐसे अनर्थ हों वहाँ से दूर ही रहना चाहिए। जहां चूहे मन भर की तराज़ू को खा जायं वहाँ यह भी सम्भव है कि चील बच्चे को उठा कर ले जाय।”

दमनक ने पूछा-”कैसे?”

करटक ने तब लोहे की तराज़ू की यह कहानी सुनाई-