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मित्र की शिक्षा मानो - Heed a Friend's Advice

मित्र की शिक्षा मानो

The weaver Mantharaka ignores his friend's advice and instead follows his wife's foolish counsel, learning that true friends speak hard truths for your own good.

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चक्रधर ने इस कहानी को सुनने के बाद स्वर्णसिद्धि से कहा-”मित्र! बात तो सच है। जिसके पास न तो स्वयं बुद्धि है और न जो मित्र की सलाह मानता है, वह मन्थरक नाम के जुलाहे की तरह तबाह हो जाता है।”

स्वर्णसिद्धि ने पूछा-”वह कैसे?”

चक्रधर ने तब यह कहानी सुनाई-


एक नगर में मन्थरक नाम का जुलाहा रहता था। वह रोज़ाना अपनी कमाई से गुज़र करता था। एक दिन उसकी कमानी टूट गई। उसे वन से लकड़ी लाने की आवश्यकता हुई। समुद्रतट पर जंगल में वह एक शमी वृक्ष के पास पहुँचा। उसने उसे काटने के लिये कुल्हाड़ी उठाई। तब उस शमी वृक्ष में रहने वाले देव ने प्रकट होकर कहा-”हे मन्थरक! इस वृक्ष के संरक्षण में मेरा भी जीवन है। तुम इस वृक्ष को मत काटो, मैं बेघर हो जाऊँगा।”

मन्थरक ने उत्तर दिया-”देवता! मेरे पास रोज़ी-रोटी का प्रबन्ध नहीं है, इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ। यदि मेरे पास लकड़ी नहीं होगी तो उपकरण नहीं बनेंगे, कपड़ा नहीं बुना जायगा, जिससे मेरे कुटुम्बी भूखे मर जायेंगे। इसलिये अच्छा यही है कि तुम किसी और वृक्ष का आश्रय लो, मैं इस वृक्ष की शाखायें काटने को विवश हूँ।”

देव ने कहा-”मन्थरक! मैं तुम्हारे उत्तर से प्रसन्न हूँ। तुम कोई भी एक वर माँग लो, मैं उसे पूरा करूँगा, केवल इस वृक्ष को मत काटो”

मन्थरक बोला-”यदि यही बात है तो मुझे कुछ देर का अवकाश दो। मैं अभी घर जाकर अपनी पत्नी से और मित्र से सलाह करके तुम से वर मांगूँगा।”

देव ने कहा-”मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।”

गाँव में पहुँचने के बाद मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई। उसने उससे पूछा-”मित्र! एक देव मुझे वरदान दे रहा है, मैं तुझ से पूछने आया हूँ कि कौन सा वरदान माँगा जाए।”

नाई ने कहा-”यदि ऐसा ही है तो राज्य माँग ले। मैं तेरा मन्त्री बन जाऊँगा, हम सुख से रहेंगे।”

तब, मन्थरक ने अपनी पत्नी से सलाह लेने के बाद वरदान का निश्चय करने की बात नाई से कही। नाई ने स्त्रियों के साथ ऐसी मन्त्रणा करना नीति-विरुद्ध बतलाया। उसने सम्मति दी कि “स्त्रियां प्रायः स्वार्थपरायणा होती हैं। अपने सुख-साधन के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी सूझ नहीं सकता। अपने पुत्र को भी जब वह प्यार करती है, तो भविष्य में उसके द्वारा सुख की कामनाओं से ही करती है।”


मन्थरक ने फिर भी पत्नी से सलाह किये बिना कुछ भी न करने का विचार प्रकट किया। घर पहुँचकर वह पत्नी से बोला-”आज मुझे एक देव मिला है। वह एक वरदान देने को उद्यत है। नाई की सलाह है कि राज्य माँग लिया जाय। तू बता कि कौन सी चीज़ माँगी जाये।”

पत्नी ने उत्तर दिया-”राज्य-शासन का काम बहुत कष्ट-प्रद है। सन्धि-विग्रह आदि से ही राजा को अवकाश नहीं मिलता। राजमुकुट प्रायः कांटों का ताज़ होता है। ऐसे राज्य से क्या अभिप्राय जो सुख न दे।”

मन्थरक ने कहा-”प्रिये! तुम्हारी बात सच है, राजा राम को और राजा नल को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था। हमें भी कैसे मिल सकता है? किन्तु प्रश्न यह है कि राज्य न माँगा जाय तो क्या माँगा जाये।

मन्थरक पत्नी ने उत्तर दिया-”तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे भी हमारा व्यय पूरा हो जाता है। यदि तुम्हारे हाथ दो की जगह चार हों और सिर भी एक की जगह दो हों तो कितना अच्छा हो। तब हमारे पास आज की अपेक्षा दुगना कपड़ा हो जायगा। इससे समाज में हमारा मान बढ़ेगा।”

मन्थरक को पत्नी की बात जच गई। समुद्रतट पर जाकर वह देव से बोला-”यदि आप वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दो कि मैं चार हाथ और दो सिर वाला हो जाऊँ।”


मन्थरक के कहने के साथ ही उसका मनोरथ पूरा हो गया। उसके दो सिर और चार हाथ हो गये। किन्तु इस बदली हालत में जब वह गाँव में आया तो लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया, और राक्षस-राक्षस कहकर सब उसपर टूट पड़े।


चक्रधर ने कहा-”बात तो सच है। पत्नी की सलाह न मानता, और मित्र की ही मानता तो उसकी जान बच जाती। सभी लोग आशारूपी पिशाचिनी से दबे हुए ऐसे काम कर जाते हैं, जो जगत में हास्यास्पद होते हैं, जैसे सोमशर्मा के पिता ने किया था।”

स्वर्णसिद्धि ने पूछा-”किस तरह?”

तब, चक्रधर ने यह कथा सुनाई-